सींच रही हूँ अब तक
कनखियों से निहारते तुम्हारे नैनों में मेरा घर , समय की शाख पर बहुत सूखा सा लम्हों के चिकने पात पर टिका नहीं बस मिटटी उड़ती रही और , कंटीली डालों पर सुमन-श्वास की आस सहारे मैं अब तक जड़ सींच रही हूँ.........
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swati
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[29 Aug 2008 07:54 AM]



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