क्यों नहीं लिखते एक ऐसी नज़्म..
एक मुट्ठी धूप, चन्द कतरे रात के एक बूढा आसमान और उस पर टंगे चाँद को समेटते हो अपने जेहन में और रच देते हो एक नज़्म कभी मेरे घर आकर देखो यहाँ भी है एक बूढा बाप शायद एक आध मुट्ठी अनाज भी मिल जाये चन्द कतरे आंसुओं के टूटी खाट के सिरहाने पड़े हैं और एक चाँ...
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pallavi trivedi
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[25 Aug 2008 02:19 AM]



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