चुप की रस्‍सी के दो किनारे...अबोल,अडोल

मातील्दा कुछ बदल गया था। वो अपने चेहरे पर उंगलियां फिराकर देखता- आंख, नाक, माथा, भंवें, कान....सब तो अपनी जगह हैं। उसे विश्‍वास न आता, तो देर तक स्‍त्री की आंखों में देखता और खु़द से ही कहता-क्‍या बदला है, सब पहले जैसा ही तो है......। हां सब पहले जैसा ही है,... [पूरी पोस्ट]
writer शायदा
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[18 Aug 2008 11:33 AM]

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