सफर - राजीव रंजन प्रसाद
अशांत थे भीष्म मन के हिमखंडों से पिघल-पिघल पड़े, गंगा से विचार.. कि कृष्ण! यदि आज तुम प्रहार कर देते तो क्या इतिहास फिर भी तुम्हें ईश्वर कहता? रथ का वह पहिया उठा कर, बेबस मानव से तुम धर्म-अधर्म की व्याख्याओं से परे यह क्या करने को आतुर थे? स्तंभ नोच...
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राजीव रंजन प्रसाद
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[12 Aug 2008 04:16 AM]



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