“अपनी...कुछ निशानी दे दो”
शिकवे और गिले करते रहे हम अपने आप ही से लड़ते रहे हम, तुमने भी नहीं कही कुछ अपनी हमें भी गिला कि न कह सके कुछ हम अपनी। इप्तदा से ही इज़हारे दिल किया हमने, इंतहा तक करार न कर सके तुम। रहा जिंदगी का सफर कुछ यूं जैसे कहीं पर जर्जर झूलता पुल, हर कदम डरत...
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Nitish Raj
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[09 Aug 2008 03:08 AM]



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