मुड़ी-तुड़ी पर्चियाँ मन के कोनों दबी हुईं

अनामदास का चिट्ठा एक डरावना सपना देखा. चारों तरफ़ कचरा है, कचरे के अंबार से घिरा हूँ, कचरे में धंसा जा रहा हूँ, छटपटा रहा हूँ, कचरा लपककर अपने आगोश में लेना चाहता है. किसी एनिमेशन फ़िल्म की तरह. सपने अक्सर याद नहीं रहते लेकिन कचरे को छोड़कर पूरे दिन कुछ नहीं सूझा, कचर... [पूरी पोस्ट]
writer अनामदास
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[07 Aug 2008 19:48 PM]

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