बालकिशन की डायरी भाग-१ सन १९८८
आज यूँही एक काफ़ी पुरानी डायरी पढ़ते हुए इन दो कविताओं पर नज़र टिक गई और फ़िर कई बार पढ़ डाला. अहसास ये हुआ कि ये कवितायें आज भी कितनी प्रासंगिक है. आप भी पढ़ें. १ ये क्या हो रहा है अपने वतन में हिंसा का बाज़ार गर्म है जाने किसका भय छाया है जन में सच पर...
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बाल किशन
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[30 Jul 2008 03:18 AM]



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