'ए खुदा...बचपन को तो बख्श
रात के वीराने में उसकी किलकारी जैसे किसी ने साँझ ढले राग यमन छेड़ दिया हो उसकी वो नन्ही-नन्ही अधखुली मुट्ठियाँ नींद में मुस्कुराते होंठ बार-बार बनता-बिगड़ता चेहरा मोहपाश में बाँध रहे थे विडम्बना यह कि वो फरिश्ता नरम बिछौना, पालना या माँ की गोद में नह...
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pallavi trivedi
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[28 Jul 2008 04:13 AM]



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