खो गये
आँखों से गुलिस्तान वो, खवाबों के खो गये रस घोलते बदन थे, गुलाबों के खो गये वो बोलती ज़बान, कहीं जा के सो गयी क़िस्से बग़ावती वो, किताबों के खो गये देखो वो मिट गये, मुक़द्दर की मार से मिलते थे जो निशान, नवाबों के खो गये उलझन में हो जब कि, हर शख्स शहर...
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श्रद्धा जैन
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[17 Jul 2008 12:08 PM]



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