मूक हमारे हो संवाद
तेरी आँखों से, मेरी आँखों तक प्यार की जब हो वार्तालाप किसी भाषा की बात न हो न हो कोई तब, जातिवाद दूर कही शहनाई बजे और बागों में खिल उठे गुलाब स्पर्श तुम्हारा बजे तरंग बन दूर कहीं जलती हो आग, एक दूजे को जाने हम जब मूक हमारे हो संवाद...
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श्रद्धा जैन
कविताShrddha Jain
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[06 Jul 2008 01:28 AM]



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