दार्जिलिंग --हरियाली के घेरे
जादुई कॊहरा फैला यूँ फिर-फिर,हर पल हर क्षण ,बन महक हवा में तिर -तिर,मन जाए रंगॊं से सन,गुनगुनाती धूप घिर-घिर,हौले से तापे जॊ तन,पराग-प्लावित पाँते जॊ गिर-गिर,बाँध जाए हठीले मन,घन की अमृत-बूँदे झिर-झिर,जाने कहाँ से सीख ये फन,लुटा कर कॊष सकल फिर फिर,ध...
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swati
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[02 Jul 2008 10:24 AM]



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