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आज़ाद लब मैं चाहता हूँ कि मेरे अहबाब और तलबा सिब्बन बैजी को दो-चार दिन पढ़ते रहें. वह ऐसे सख्स हैं जिनसे मेरा तआल्लुक निजी तो है ही, अदबी भी है. उनसे मैंने बहुत सीखा है. इसके बाद मुझे कभी-कभार पिता जैसी मोहब्बत देने वाले निदा फाज़ली की वे रचनाएँ आप पढ़ेंगे... [पूरी पोस्ट]
writer विजयशंकर चतुर्वेदी
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[27 Jun 2008 13:53 PM]

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