तालाब नहीं भाते हैं..

सफर - राजीव रंजन प्रसाद मुझे तालाब नहीं भाते हैंठहर जाते हैंऔर तुम इसीलिये उदास करती हो मुझे..तुममें अपनी परछाई देखता हुआखीज कर फेंकता हूँ पत्थरभँवरें मुझतक आती हैंफिर ठहर जाती हैं..शाम कूट कूट कर लाल मिर्चझोंक देता है मेरी आँखों मेंमैं पिघल पिघल कर बहा जाता हूँठहर जाता हूँ... [पूरी पोस्ट]
writer राजीव रंजन प्रसाद
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[30 May 2008 02:43 AM]

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