एक घर, जो हवा में तैरता है

मातील्दा जब वो घर था, तब दुनिया में कुछ नहीं था। न सड़कें थीं, न कारख़ाने, न चौराहे थे, न लोग। दुनिया में कोई हिमालय नहीं था, कोई समंदर भी नहीं. कोई आग नहीं थी, कोई पानी नहीं. तब कोई भाषा भी नहीं थी. सिर्फ़... [पूरी पोस्ट]
writer शायदा
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[17 May 2008 09:31 AM]

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