बूढ़ा जीवन रीता रीता -पर न जाने कब मैं मुक्ति पाऊंगा

कुछ इधर से  ,कुछ उधर  से अब जब सब की बहुत जरुरत है किसी के पास भी समय नहीं है हर समय आकाश को तकताबूढी माँ को देखा करता आँखों में वो अकेलापन कोई नहीं शायद देख पाया पर चूकिंमैं उसके कोख से जन्मा था उसका दर्द मेरे दर्द से अलग ना हो पाया अब जब मैं भी बूढ़ा हो चला हूँ घुटने बोल चुके... [पूरी पोस्ट]
writer दीपक गर्ग
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[18 Jun 2010 03:32 AM]

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