यार, यहां पर बड़ी Politics हो रही है।

ठाले बैठे... बस यूं ही... मुझे नफ़रत हैं ऐसे लोगों से। लेकिन क्या करें, कुछ लोगों की दुकानदारी ही ऐसे चलती है। वो उस मछली के किरदार में होते हैं जो पूरे तालाब को सड़ा देती है। जिनका स्वार्थ ही दूसरों को छोटा साबित करके ख़ुद को बड़ा बनाना है। और आख़िर में अपनी आदत से मजबूर होकर वो... [पूरी पोस्ट]
writer अनुराग मुस्कान
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[17 Jun 2010 13:00 PM]

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