रात के अंधरे में एक सन्नाटा है..
इस रात के बेपनाह अँधेरे में,एक सन्नाटा है...हवा एक सरगोशी सी कर रही...पूछ रही है ये हवा आज,इस गहरे सन्नाटे में तू आज चुप क्यों है..कोई गीत क्यूँ नहीं सुनाता...कोई नज़्म क्यूँ नहीं पेश करता...कौन सी पुरानी बातों को मुट्ठी में बंद करूँ,कौन सा गीत पेश...
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abhi
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[17 Jun 2010 12:30 PM]



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