***जुनून***
पा लूँ तुझे ये थी आरजूहर सिम्त में ढूँढा कियेरहे भटकते हम दर-बदरजलाए आँखों के दिए .....तेरी जुस्तजू से "जु" लिया,तेरे नूर से मुझे "नू" मिला .तू नहीं मिला है यही गिला,इस बात का ये मिला सिला--मेरी आँखों में कुछ नमी-सी है,उस नमी से "न" को चुरा लियाएक "जु नू...
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ज्योत्स्ना पाण्डेय
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[17 Jun 2010 08:13 AM]



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