संवाद
डूबते सूरज कीमद्धिम आभा सेपहरो चुपचाप हीं निहारते हुयेआस-पासकोई संध्या अजनबी सा वजूदडोलता है मेरे आस-पासकहीं ये मैं तो नहींकभी/ उन बेहाया के फूलों के संगगुपचुप मुस्कुराते हुयेकभी/मंदिर के कंगरे पर बैठे हुयेबहुत कुछ हैहमारे इर्द-गिर्दसिव इन्सानों केजिनसे...
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सौरभ के.स्वतंत्र
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[16 Jun 2010 22:57 PM]



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