बचपन

मनोरमा याद बहुत आती बचपन की।जब करीब पहुँचा पचपन की।।बरगद, पीपल, छोटा पाखर।जहाँ बैठकर सीखा आखर।।संभव न था बिजली मिलना।बहुत सुखद पत्तों का हिलना।।नहीं बेंच था फर्श भी कच्चा।खुशी खुशी पढ़ता था बच्चा।।खेल कूद और रगड़म रगड़ा।प्यारा जो था उसी से झगड़ा।।बोझ नहीं था सर... [पूरी पोस्ट]
writer श्यामल सुमन

कविता

views
18
upvote
3
downvote
0
rating
3
comments
22
[16 Jun 2010 21:46 PM]

Free Vedic Astrology From Astrobix