सूखे पत्तों की गीली सदा [मुक्तक] - अजय ...

साहित्यशिल्पी.इन टूटते सूखे पत्तों की गीली सदा गुज़रे लम्हों को आवाज़ देती हुई प्यासी नदियों को छूती सिसकती हवा खाक-ए-पा को भी परवाज़ देती हुई गर्म नश्तर सी किरणों को काँधे लिए आ पहुँचता है सूरज भी होते सहर सुबह से रात तक वक्त कोई नहीं अब बची है महज़ दोपहर, दोपहर अतिरिक्त...... [पूरी पोस्ट]
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[16 Jun 2010 20:30 PM]

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