"माँ!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
माता के उपकार बहुत, वो भाषा हमें बताती है! उँगली पकड़ हमारी माता, चलना हमें सिखाती है!! दुनिया में अस्तित्व हमारा, माँ के ही तो कारण है, खुद गीले में सोती वो, सूखे में हमें सुलाती है! उँगली पकड़ हमारी…….. देश-काल चाहे जो भी हो, माँ ममता की मूरत है, धोकर...
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डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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[16 Jun 2010 21:23 PM]



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