चाय बिन मांगे , पानी मांगे से हम पिलाने लगे ---एक ग़ज़ल
कहते हैं -- अतिथि देवो भव: । हमारे देश में अतिथि का आदर सत्कार करना परम कर्तव्य माना जाता है । लेकिन ऐसा लगता है कि बदलते ज़माने के साथ यह सोच भी बदल रही हैं ।बोर्ड रूम में मीटिंग चल रही थी । अस्पताल की गर्म समस्याओं पर गर्मागर्म बहस चल ही थी । बाहर भी...
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डॉ टी एस दराल
ग़ज़ल
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[16 Jun 2010 20:00 PM]



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