मैं अच्छा कैसे बन जाऊं, मैं अच्छाई से डरता हूँ....

दिल की कलम से... इसमें कुछ प्रश्न छिपे हैं जो कभी बचपन में उठा करते थे...फिर आज की एक सोच दिखानी चाही...प्रश्न अभी भी मन में है...इसलिए आपसे उत्तर की आशा रखता हूँ.....मर्यादा जीवन भर पूजी, बदले मे वनवास मिला...बड़ी सती थी जिसको कहते जग का तब उपहास मिला...शिव का आधा अंग... [पूरी पोस्ट]
writer दिलीप
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[16 Jun 2010 12:51 PM]

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