ऐ जिन्दगी ! मैं संवारूं भी तुझे तो क्या सोचकर !

अंधड़ ! जख्म जो दिए, वो रखे है मैंने ज़िंदा खरोंचकर !ऐ जिन्दगी ! मैं संवारूं भी तुझे तो क्या सोचकर !! मुरादें बही सब धार में, फंसा ही रहा मझधार में,अब लाभ है क्या, सैलाब के अवशेषों को पोंछकर !ऐ जिन्दगी ! मैं संवारूं भी तुझे तो क्या सोचकर !!मन में बसा इक घाव है,... [पूरी पोस्ट]
writer पी.सी.गोदियाल

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[16 Jun 2010 07:21 AM]

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