खुद को धोखे देने की बीमारी, तुम्हारी याद और जिम मोरिसन
दो यातना भरे दिन सुलगते रहे. रात को कड़कती बिजली की चीख पुकार के बावजूद रोने को आतुर आसमान के तले नशे में आराम से सोया रहा. स्मृतियों का जो बचा हुआ समान है, उस पर कमबख्त समय नाम की दीमक भी नाकाम है. कोई हल नहीं होता कोई याद नहीं जाती. सत्रह साल पहले कभी...
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hathkadh
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[16 Jun 2010 04:27 AM]



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