वाह रे वाह
ग़ज़ल वहशी को इंसान पे तरजीह, वाह रे वाह आन को दें ईमान पे तरजीह, वाह रे वाहमात्रा मोड़ के, कायदे तोड़ के, बोले गुरजीदीजो बहर को ज्ञान पे तरजीह, वाह रे वाहख़ुद तो ‘सुबहू’, ‘ईमां’, ‘सामां’ लिखके खिसके-‘नादां’ को ’नादान’ पे तरजीह, वाह रे वाहचार छूट जब...
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संजय ग्रोवर Sanjay Grover
व्यंग्य
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[16 Jun 2010 03:41 AM]



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