माही बह रही थी

मौलश्री माही नदी के पानी पर ढाक के पेड़ों की सुनहरी काली छाया ,  चांदी का वरक लपेटे बहता प्रवाह और किनारे की बजरी पर उगी नरम घास अनारो के कबीलाई मन के संस्कार बन चुके थे. उसका बचपन यहीं रेत में लोट-लोटकर उजला हुआ था. घंटों नदी के पानी में पैर डालकर बैठी... [पूरी पोस्ट]
writer Aparna Manoj Bhatnagar

कहानी

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[16 Jun 2010 03:37 AM]