ईंट-गारे से छत नहीं होती
आज फिर अखबार में पढ़ा ...ऑनर किलिंग ...एक और बेटी भेँट चढ़ गई...जाने वाली की नजर से ...घर के बाहर तो छत तो नहीं होतीघर के अन्दर ही मेरी छत छीनी क्यों कर ?मेरे सिर पर जो लहराता था बादल बन करउसी बादल की नमी सोखी किसनेबिजली बन कर मेरी साँसों की गति रोकी...
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शारदा अरोरा
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[16 Jun 2010 03:21 AM]



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