थोड़ा नमक था उनमें दुख का, सुख का थोड़ा महुआ

कबाड़खाना ग्वालियर में रहने वाले हमारे कबाड़ी मित्र अशोक कुमार पाण्डेय ने अपनी यह लम्बी कविता मुझे कुछ दिन पूर्व भेजी थी. एक बड़े फलक पर फैली यह कविता हमारी इस इक्कीसवीं सदी पर काफ़ी धारदार और ज़रूरी टिप्पणी है. कविता लम्बी है और ध्यान से पढ़े जाने की दरकार रखती... [पूरी पोस्ट]
writer Ashok Pande
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[15 Jun 2010 22:30 PM]

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