‘‘आदमी का अब जनाजा, जा रहा संसार से’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
“25 साल पुरानी मेरी एक रचना” आदमी के प्यार को, रोता रहा है आदमी। आदमी के भार को, ढोता रहा है आदमी।। आदमी का विश्व में, बाजार गन्दा हो रहा। आदमी का आदमी के साथ, धन्धा हो रहा।। आदमी ही आदमी का, भूलता इतिहास है। आदमी को आदमीयत का नही आभास है।।...
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डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
कविता
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[15 Jun 2010 12:37 PM]



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