दस्तक
एक पुरानी रचना कुछ संशोधनों के साथ पेश कर रही हूँसुनी है बिन आहट, उस दस्तक पर ऐतबार हैअहद-ए-वस्ल हुआ नहीं ,फिर भी इंतज़ार हैगुज़रा यूँ हर लम्हा ,तस्सवुर में तेरे जानांबेकरारी के पहलू में ज्यूँ मिल गया करार हैएहसास मेरे महके ,ज्यूँ तेरे कलामों मेंसाँसों से...
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roohshine
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[06 May 2010 00:18 AM]



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