तेरी हस्ती का ख़ुमार
करती हैं ,हिज्र की रातें,तप तप के बेक़रार सुकूँ दे जाते हैं ,दिल को, तसव्वुर के आबशार कभी होते हैं हम साथ ,वादी-ए -कश्मीर में गुज़रती हैं चांदनी रातें कभी ,रेगिस्तान-ए-थार बहक जाती हूँ ,महक पा के तेरी साँसों कीखयालों में ,यूँ समां हो जाता है गुलज़ार साथ...
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roohshine
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[29 May 2010 08:42 AM]



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