किसे पुकार रहा था वो डूबता हुआ दिन-आबिदा-नसीर तुराबी
आबिदा जिस मौज में कहती हैं हम उसी मौज में सुनते हैं... डूबते उतराते गुनते हैं... समझ आती है बात थोड़ी -थोड़ी...बिन मोल बिकें…थम जाएँ किसी चादर का कोना पकड़…वहीं के हो रहें..धंस जाते हैं रेत में गहरे बहुत गहरे पैर जैसे..उतरे अँधेरी बावड़ी कोरा भरोसा लिए तब...
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पारूल
आबिदा परवीन
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[15 Jun 2010 11:23 AM]



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