आओ, धर्म धर्म खेलें !!
विगत दो माह से ब्लोग जगत को खन्गालनें के बाद,मेरे ध्यान में आया कि बुद्धिजीवी लोग धर्म पर चर्चा मात्र से कतराते हैं। कोइ सज्जन तो सोचते है, क्यों पंगा लें, तो कोई इसलिये कि यह सम्वेदनशील मामला है। कुछ लोगों का मत है,क्यों फ़ाल्तू की बहस करना या फ़साद खडा...
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सुज्ञ
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[15 Jun 2010 11:04 AM]



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