बन्दिनी वर्षा, बन्दिनी मैं................... घुघूती बासूती

घुघूती बासूती वर्षा तू भी तो मजबूर हैइस शहर में,मुझ सी तू भी कैदी है!जैसे मैं इतनी खिड़कियोंबाल्कनियों के होने पर भी,हूँ सलाखों के पीछेतू भी तो चाहे बरसती है अपने मन सेफिर भी गति न है तेरी तेरे मन की।प्रकृति में क्या है उद्देश्य वर्षा का?बादलों से तकना प्यासी धरती... [पूरी पोस्ट]
writer Mired Mirage

कविता

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[15 Jun 2010 08:28 AM]

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