आसमान से टूटा तारा...आँख से टूटी पलक....और इंसान की फितरत...
अक्सर सोचता हूँ जब भी तारा टूटता है या पलक का बाल टूट कर गिरता है...तो हम कुछ मांगते क्यूँ है...उसी सवाल का जवाब जो सोच पाया वही है ये रचना...पुरानी है...थोड़े संपादन के साथ...नभ के दामन से कल इक सितारा गिरा...माँ के आँचल का सूना हुआ फिर सिरा...माँ को...
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दिलीप
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[15 Jun 2010 08:50 AM]



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