पत्र,पात्र और मित्र...

हिंदी हैं हम.. प्रिय साँझ, बरसों से तुम्हें इसी नाम से पुकारा है..संध्या नाम मेरी दादी का था|इसलिए कभी उस नाम से पुकार ही नहीं पाया|जानती हों क्यों.. क्योंकि ये नाम मैंने कभी प्रेम से सुना ही नहीं था|दादाजी की कडकती रोबदार आवाज़ में जब हमारे घर में ये नाम गूंजता,तो वो... [पूरी पोस्ट]
writer आस्था "देव"
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[15 Jun 2010 08:31 AM]

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