अनजाने अक्स
कभी कभी तन्हाई में टिक जाती है नज़रकहीं शून्य मेंउतरने लगते हैं अक्स जान - पहचान
औरअनजान लोगों के...और मैं घबरा करबंद कर लेती हूँ पलकें...
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संगीता स्वरुप ( गीत )
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[15 Jun 2010 06:31 AM]



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