तद्गुण अलंकार [काव्य का रचना ...

साहित्यशिल्पी.इन असर सँग का जब दिखे, लें तब तद्गुण मान। नीरस भी रस-निधि बने, शुष्क बने रस-खान।। सत्संगति से गुण बढ़ें, दोष बढ़ाये कुसंग। दोनों में 'तद्गुण' 'सलिल', तत्त्व एक दो रंग।। जब किसी वस्तु द्वारा समीपवर्ती वस्तु के गुण या गुणों अपना लेने की विशेषता वर्णित की जाती... [पूरी पोस्ट]
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[15 Jun 2010 03:30 AM]

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