मैं तो मायूस लौटा हूँ

नीरव जरूरी नहीं कि चीजें सुलझती है अक्ल के हवाले सेमैंने तो अक्सर सुलझते देखा है इन्हें हीले-हवाले सेगर तेज हो हवा तो गुल हो जाती है शमाकुछ दिए जब भी जलते रहते हैं तूफान में मतवाले सेमौत अजीब शै है, दूर कर देती है शक्लो सूरतयाद कहाँ छीन पाता है कोई माशूक की... [पूरी पोस्ट]
writer डॉ. राजेश नीरव
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[14 Jun 2010 23:33 PM]

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