महफ़ूज़ भाई किधर हो आज़ कल
आर्ची आज़ भी महफ़ूज़-भैया को तलाशती है अंकुर-भैया और महफ़ूज़ भैया में उसके लिये कोई फ़र्क नहीं है. आर्ची एक सा स्नेह बांटती है दौनो से दूर सपने संजोती है अंकुर भैया आएंगे मेरे पास खूब सारी गुडिया हो जाएंगी खेलने को ...आर्ची...
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गिरीश बिल्लोरे
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[14 Jun 2010 15:20 PM]



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