संयोग – वियोग....
भावुक मन था रोक न पाई, सजा हुआ पलकों में सावन संयोग–वियोग की दीवारों पर, बरसे थिरक-थिरक श्याम् घन याद में तेरी इस बावरी ने, लाखों आँसू हैं बरसाये मरूथल में खोये अतीत के, संयोग स्मृति में उग आयेबारम्बार चीखता है मन, दृगों से निज कण्ठ मिलाकर देव तुझे सच पा...
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प्रकाश टाटा आनन्द
मेरी पहली रचना (1979)
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[21 May 2010 06:04 AM]



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