बूंदे

A poetess blog लटों में उलझी बूंदेयूँ लगती है जैसेकाली रात नेउलझा लिए हैं खुद मेंढेर सारे सितारेऔर वो गिर रहे हैंटूट टूट करकधों से फिसलतीइधर उधर गुज़रतीगुदगुदी लगाती ये बूंदेबताती है पलों का मोलदो पल ठहरती हैंऔर बिखर जाती हैंपर ज़मीन पररंगत बिखेर जाती हैं... [पूरी पोस्ट]
writer ranjana
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[14 Jun 2010 10:28 AM]

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