एक बुत मैडम तुसाद में .
बैठ कुनकुनी धूप में
निहार गुलाब की पंखुड़ी
बुनती हूँ धागे ख्वाब के
अरमानो की सलाई पर.
एक फंदा चाँद की चांदनी
दूजा बूँद बरसात की
कुछ पलटे फंदे तरूणाई के
कुछ अगले बुने जज़्बात के ....
सलाई दर सलाई बढ...
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shikha varshney
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[14 Jun 2010 08:47 AM]



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