तुम कहती हो - ना डरा डरा सोचूं जो भी सोचूं हरा भरा सोचूं
तुम कहती हो नाना डरा-डरा सोचूंजो भी सोचूं हरा-हरा सोचूंतुम्हीं बताओ कैसे?तुम बस एक ही बार मिली थीमुझे साफ-साफ दिखा थाकि अब कोई मंजिल बाकी नहींपर तुम चलीं गयींअब सब बाकी है तुम्हारे सिवाडर, घृणा, झूठ, बेबसी, अफसोसऔर रोतले गीत, सिसकती गजलेंऔर अब फिरक्या...
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Rajey Sha
कविता Kavita
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[14 Jun 2010 07:58 AM]



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