एक और रात का सफर
शब्द खो गए हैंशेष है/ सिर्फ़ मौनचाहता है मनतमाम अनुभवों को बांटना करना तमाम बातेंमौसम की, फूलों की,हवाओं कीकुछ तुम्हारी मेरी अपनी भी।मगर/उन गिने चुने पलों कोतौलती तुम्हारी बेरुखी मेंमुखर होता हैसिर्फ़ मौन।शायद कल मिलेअनुकूल शब्द और पल भीदे सकूं...
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सौरभ के.स्वतंत्र
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[14 Jun 2010 07:50 AM]



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