हैं उठ रहीं मेरे मन में खराब-सी बातें-gazal
हैं उठ रहीं मेरे मन में खराब-सी बातेंथीं करनी तुमसे मुझे बेहिसाब-सी बातेंहो तुम भी, हम भी हैं जब साफगो, उठीं फिर क्योंहमारे बीच बताओ नकाब-सी बातेंबगैर जाम के मदहोश कर दिया उसनेरहा वो करता ही हर पल शराब-सी बातेंइलाही तुम ही हो क्या रूबरू मेरे ये...
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श्याम सखा 'श्याम'
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[14 Jun 2010 07:20 AM]



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