लीजिए भई –प्रेमचंद, महादेवी, हरिऔध, पंत सब मर गए

अपना घर मै स्त्रीवादी हूँ, सदियों से लानत मलामत झेलती स्त्री के किसी गलत निर्णय पर कई बार मेरा रिएक्शन भी अजीब बेतुकाना हो जाता हैं, साथ ही उस गलत स्त्री को कुल्टा, कंलंकिनी, कुलबोरनी कहने के बजाय मैं भावावेश मे कह बैठती हूँ कि ठीक किया फलाँ ने..जरूरत से ज्यादा... [पूरी पोस्ट]
writer आभा

हिंदी के धरोहरों की मौत

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[14 Jun 2010 05:53 AM]

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