नारीत्व का अभिशाप झेलती नारी
नारीत्व का अभिशाप झेलती नारीनारी की गौरवगाथा आकाश को चूमे या पतन से आकाश काँपे पर सत्य यही है की नारी के लिए ना सावन सूखे ना भादों हरे ! वो कल जैसी थी आज भी वैसी ही है! उसे बस त्याग , संयम तथा आत्मदान की आग में अपना व्यक्तित्व को बस जलते ही समाज देखना...
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अग्निमन
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[14 Jun 2010 04:39 AM]



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